सहरी खाना सुन्नते रसूल है , उसमें बरकत है बिना सेहरी के रोज़ा रख कर ढिंढोरा पीटना सुन्नत के विरुद्ध

सहरी खाना सुन्नते रसूल है , उसमें बरकत है

बिना सेहरी के रोज़ा रख कर ढिंढोरा पीटना सुन्नत के विरुद्ध

सहरी खाना सुन्नते रसूल है , उसमें बरकत है

बिना सेहरी के रोज़ा रख कर ढिंढोरा पीटना सुन्नत के विरुद्ध

————– डॉ एम ए रशीद, नागपुर

सहरी अरबी भाषा का शब्द है , इसका अभिप्राय निर्जल व्रत के दिन बहुत तड़के किया जाने वाले भोजन से है , इसे रमज़ान के दिनों में कुछ रात रहे का खाना कहा जाता है , जिसे खाकर रोज़ा रखा जाता है। हज़रत अनस इब्ने मालिक रज़ि फ़रमाते हैं कि अल्लाह के रसूल सअव ने फ़रमाया “सहरी खाओ क्योंकि सहरी खाने में बरकत है”। रमज़ान के रोज़ों में इसका बड़ा महत्व है । ऐसा भ्रम पाया जाता है कि सहरी में रोज़दार भरपेट खाना खाते हैं जबकि ऐसा नहीं है। इस प्रकार की भ्रांति को दूर कर यह कहना ज़रूरी है कि सहरी के समय इक्का दुक्का रोज़दारों को छोड़कर बाकी सभी एक दो खजूर , 1कप दूध , आधा एक गिलास पानी या एक चाय पीकर पूरे दिन का रोज़ा रख लेते हैं और कुछ हैं कि बिना सहरी खाए रोज़ा रख लेते हैं । जबकि ऐसा नहीं करना चाहिए । सहरी के बारे में कुछ लोगों का कहना होता है कि वह सहरी को सुन्नत और बरकत की चीज की बजाए बिना सहरी के रोजा रखना बड़ा कमाल समझते हैं । ऐसे समय उठते हैं जब सहरी का समय निकल गया होता है। ऊपर से इसे वह ज्यादा सवाब का कारण भी समझते हैं और वे बिना शहरी का रोजा रख लेते हैं । बड़े दावे और गौरव से कहते हैं और उसका ढिंढोरा भी पीटते हैं कि इतनी भयंकर गर्मी में मैंने बिना सहरी के रोज़ा रखा है। इनमें कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो तरावीह की नमाज़ के बाद खाना खा पी कर निश्चिंत होकर सो जाते हैं कि सहरी में नींद नहीं खुल पाएगी। उन्हें नींद इतनी प्यारी होती है कि वे सहरी खाना छोड़ देते हैं। ऐसे लोगों के लिएं बरकत से महरूम शब्द का उपयोग दुरुस्त समझा जा सकता है।

बहुत सी हदीस ग्रंथों में सहरी की विशेषताओं का वर्णन मिलता है। इसीलिए सहरी खाकर रोज़ा रखना उम्मते मोहम्मदिया की विशेषता को दर्शाता है। यह सर्व विदित है कि पहली उम्मतियों पर रोजे तो फ़र्ज़ थे मगर उन्हे सहरी की बरकत हासिल नहीं थी। अहले किताब के यहां इफ्तार के बाद सो जाने से अगला रोज़ा शुरू हो जाता था। इसीलिए पैगंबर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि हमारे रोज़ा और अहले किताब के अर्थात यहूदी और ईसाइयों के रोज़े में अंतर सहरी खाने का है कि वे सहरी नहीं खाते । एक जगह इरशाद फ़रमाया कि स्वयं अल्लाह रब्बुल आलमीन और उसके फरिश्ते सहरी खाने वालों पर रहमत नाज़िल फरमाते हैं । इसीलिए अल्लाह के रसूल हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सहरी को बरकत घोषित किया । एक दूसरी हदीस में रहमतुललिल अलमीन हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इसे बाबरकत खाना फ़रमाया है । एक हदीस में उन्होंने फ़रमाया कि सहरी बरकत है , तुम्हारे रब की तरफ से अतिया है इसलिए इसे ना छोड़ो । हजरत अब्दुल्लाह बिन हारिस , एक सहाबी सका अनुसरण करते हुए कहते हैं कि मैं नबी हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में ऐसे वक्त हाज़िर हुआ जब आप सहरी खा रहे थे। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि यह बरकत की चीज़ है जो अल्लाह तआला ने तुम्हें अता फ़रमाई है इसको मत छोड़ना । उनका एक और इरशाद है कि तीन चीज़ों में बरकत है जमाअत , इसका तात्पर्य यह है कि जमाअत नमाज़ की हो , या हर वह काम जो मुसलमानों का एक संगठन मिलकर करे क्योंकि अल्लाह तआला की सहायता, रहमत और बरकत जमाअत के साथ है और फ़रमाया सरीद में बरकत है और तीसरे नंबर पर फ़रमाया सहरी खाना कि इसमें बरकत है। नबी करीम सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम जब किसी इस्लामी हीरो यानी सहाबी को अपने साथ सहरी खाने के लिए बुलाते तो इरशाद फ़रमाते खाओ और बरकत वाला खाना खाओ ! एक और हदीस ग्रंथ में है जिसमें कहा गया है कि सहरी खा कर शक्ति हासिल करो और क़ैलूला अर्थात दोपहर को थोड़ा आराम करके रात की इबादत से तात्पर्य तहज्जुद पर मदद हासिल करो। सहरी के संबंध में और अधिक जानकारी में आया है कि “और कुछ न हो तो एक खजूर या एक छुआरा ही खा ले या एक घूंट पानी ही पी ले” । इस लिए रोज़े रखने वालों को सहरी का प्रबंध करना चाहिए। अपना ही फायदा है और मुफ्त की नेकी है।

बरकत शब्द पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है और इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है विचारणीय पहलू है। बरकत का अर्थ स्थिरता और एकाधिक लाभ से बताया गया है। क़ुरआन और हदीस में आमतौर पर बरकत से तात्पर्य एकाधिक लाभ से बताया गया है। बरकत अल्लाह का अनुग्रह, विनीत भाव और वरदान है

जो इंसान के पास ऐसी पवित्र स्थान से आता है जिसका वह न अनुमान लगा पाता है और न ही उसका वहां ध्यान जा पाता है। इसलिए प्रत्येक कर्म जिसमें अगोचर वृद्धि और गुणन होता है, वह अल्लाह का वरदान , अनुग्रह और विनीत भाव कहलाता है। यहां कहने का तात्पर्य यह है कि चीज़ें छोटी और नाम मात्र में दिखाई देती हैं, लेकिन उसकी तुलना से लाभ और परिणाम बहुत अधिक होते हैं । अल्लाह ही वरदान अनुग्रह देने वाला है , और यह बरकत उसी की ओर से होती है। मसनद ग्रंथ में एक हदीसे क़ुदसी है कि “अल्लाह सर्वशक्तिमान कहता है कि जब मेरी बात मानी जाती है तब मैं आनन्दित होता हूँ और बरकतें भेजता हूं और मेरी बरकतों का कोई अंत नहीं” । प्रत्येक शुभ और नेक कार्य बरकत का स्रोत होते हैं । इसी लिए सहरी खाना पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का अनुसरण है और आज्ञाकारिता के दर्जे की बात ।

बरकत अल्लाह का क़ीमती उपहार है जो भौतिक संपत्ति से परे है। जब सर्वशक्तिमान अल्लाह किसी व्यक्ति को उसकी उम्र में बरकत देता है, तो वह उसे अपनी आज्ञाकारिता में रखता है या उस से कई अच्छी चीजें , जन सेवाएं करवाता है । जब अल्लाह सर्वशक्तिमान धन में बरकत देता है, तो वह इसे बढ़ाता है और धन के मालिक को इसे अच्छे कामों में खर्च करने में सक्षम बनाता है। जब सर्वशक्तिमान अल्लाह बच्चों में बरकत देता है, तो वह बच्चों को नेक बनाता है और जब अल्लाह पत्नी में बरकत देता है तो उसे पति के लिए आराम का स्रोत बना देता है और पति उसे देखकर खुश हो जाता है , घर जन्नत का गहवारा बन जाता है। पत्नी पति की अनुपस्थिति में अपने मान सम्मान और अमानत की रक्षा करती है । जब अल्लाह सर्वशक्तिमान किसी के कर्मों में बरकत देता है, तो उसके सभी कर्म अल्लाह की प्रसन्नता और पैगंबर का अनुसरण करने के लिए किए जाने लगते हैं। इनमें वे सब काम होते हैं जो नेकियों और भलाइयों से जुड़े होते हैं।

Updated : 8 April 2022 11:46 PM GMT

Shubham Gote

Mr. Shubham Gote is involved in the day-to-day operations of the company along with the business expansion strategies of the print media division of the group. He also supervises the performance of the company in terms of the business plans. He has been on the Board of the Company since November 2009.

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